क्षणिक ही सही पर, गुन्नू के बिना सूना संसार

क्षणिक ही सही पर, गुन्नू के बिना सूना संसार

भूमिका

दादी और बच्चे का रिश्ता शब्दों से परे एक ऐसी अनुभूति है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। यह कविता उसी भावभूमि पर खड़ी है, जहाँ एक नन्हीं-सी उपस्थिति पूरे जीवन को रंगों से भर देती है और उसकी अनुपस्थिति हर रंग को फीका कर जाती है। ‘गुन्नू’ यहाँ केवल एक बच्ची नहीं, बल्कि उस खुशी, चहल-पहल और जीवन्तता का प्रतीक है, जो घर के हर कोने को जीवंत बना देती है।

रचनाकार विजया डालमिया ने बड़ी सरलता और संवेदनशीलता से यह चित्र उकेरा है कि कैसे एक मासूम की अनुपस्थिति दिन को बोझिल और रात को गहरा बना देती है। हर पंक्ति में दादी के हृदय की वह बेचैनी झलकती है, जो अपने बच्चे के बिना अधूरी हो जाती है।

यह कविता न केवल वात्सल्य रस का सुंदर उदाहरण है, बल्कि यह भी बताती है कि जीवन की असली धड़कनें उन छोटे-छोटे रिश्तों में बसती हैं, जिन्हें हम अक्सर सामान्य समझ लेते हैं।



कविता

फीकी हंसी, आँखें हैं रोती

एक पल भी चैन से ना सोतीं 

खाना कुछ खा नहीं पाती 

मेरी गुन्नू जब पास ना होती 


 रात कुछ और गहरी हो जाती 

 दिन की घड़ियां बैरी हो जातीं

 सूरज किरण सुनहरी ना होती 

 गुन्नू मेरी जब पास ना होती 


बातें भी कहीं खो जातीं 

मां की पुकार बंद हो जाती

कहीं कोई हलचल न होती 

गुन्नू मेरी जब पास ना होती 


 सारी चाह तुरत थम जाती

 मस्ती मेरी सुस्ती में आती 

 दुनिया में चटक पटक ना होती 

 गुन्नू मेरी जब पास ना होती 


बंद है टीवी बंद दरवाजे

जिद सारी खामोश हो जाती 

 कहीं कोई मनुहार ना होती 

 गुन्नू मेरी जब पास ना होती 


पेन, पेपर, खिलौने, कारें

चुपचाप पड़े सारे के सारे

किसी में कोई हरकत ना होती 

गुन्नू मेरी जब पास ना होती 


 कब आएगी, मुस्कायेगी

 लबों को मेरे चहकाएगी

 दिल से ये आवाज है आती

 गुन्नू मेरी जब पास ना होती

रचनाकार

विजया डालमिया 

राष्ट्रीय संयोजिका 

उलझन सुलझन, महिला लेखिका इकाई

हैदराबाद

पाठ्य उन्नयन और विस्तार 




प्रस्तुति






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