मेरी गुन्नू
मेरी गुन्नू
मेरी गुन्नू गुनगुन करती
मुस्कानों के मोती झरती
आँखों में शरारत लेकर
हर दिल में प्यार है भरती
वो सोई जब तक रहती
मेरी कोई सुबह ना होती
आँखों से आँखें मिलते ही
मेरी उसकी बातें होतीं
सूना आँगन, सूना सा मन
पास जब तक न ठुमकती
ना कोई हल्ला, ना ही हलचल
भागम भाग जब ना करती
नाजुक नन्हा स्पर्श देकर
प्राणों में संजीवनी भरती
मेरी गुन्नू गुनगुन करती
मुस्कानों के मोती झरती
सृजक
विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका
उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका विंग)
हैदराबाद (तेलंगाना)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति






टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें