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क्षणिक ही सही पर, गुन्नू के बिना सूना संसार

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क्षणिक ही सही पर, गुन्नू के बिना सूना संसार भूमिका दादी और बच्चे का रिश्ता शब्दों से परे एक ऐसी अनुभूति है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। यह कविता उसी भावभूमि पर खड़ी है, जहाँ एक नन्हीं-सी उपस्थिति पूरे जीवन को रंगों से भर देती है और उसकी अनुपस्थिति हर रंग को फीका कर जाती है। ‘गुन्नू’ यहाँ केवल एक बच्ची नहीं, बल्कि उस खुशी, चहल-पहल और जीवन्तता का प्रतीक है, जो घर के हर कोने को जीवंत बना देती है। रचनाकार विजया डालमिया ने बड़ी सरलता और संवेदनशीलता से यह चित्र उकेरा है कि कैसे एक मासूम की अनुपस्थिति दिन को बोझिल और रात को गहरा बना देती है। हर पंक्ति में दादी के हृदय की वह बेचैनी झलकती है, जो अपने बच्चे के बिना अधूरी हो जाती है। यह कविता न केवल वात्सल्य रस का सुंदर उदाहरण है, बल्कि यह भी बताती है कि जीवन की असली धड़कनें उन छोटे-छोटे रिश्तों में बसती हैं, जिन्हें हम अक्सर सामान्य समझ लेते हैं। कविता फीकी हंसी, आँखें हैं रोती एक पल भी चैन से ना सोतीं  खाना कुछ खा नहीं पाती  मेरी गुन्नू जब पास ना होती   रात कुछ और गहरी हो जाती   दिन की घड़ियां बैरी हो जातीं ...

नव लय पथ

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नव लय पथ भूमिका शब्द जब लय से मुक्त होकर भी संगीत रचते हैं, तब वे केवल अभिव्यक्ति नहीं रहते—वे अनुभव बन जाते हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ उसी अनुभव की एक सजीव मिसाल हैं, जहाँ छंद की परंपरागत सीमाओं से परे जाकर भी भाषा अपनी आंतरिक ताल और स्वाभाविक प्रवाह से पाठक को बाँध लेती है। अगर-मगर की उलझनों को झटक कर, सटर-पटर की चंचलता में मटक कर, और नगर-नगर बसर करते हुए जीवन की विविधता को समेटती ये पंक्तियाँ हमें एक ऐसे भावलोक में ले जाती हैं, जहाँ हर शब्द अपने आप में एक चित्र है, हर ध्वनि एक स्पंदन। यहाँ न केवल यात्रा है, बल्कि उस यात्रा का जीवंत उत्सव भी है—डगर-डगर भटकने की बेचैनी, रमक-झमक की आभा, और लहक-महक की सहजता। विजया डालमिया जी का यह अमात्रिक प्रयास परंपरा और नव्यता के अद्भुत संगम का परिचायक है। बिना मात्राओं के बंधन में बँधे, उन्होंने जिस प्रकार ध्वनियों और शब्दों के सहारे एक लयात्मक संसार रचा है, वह उनकी सृजनात्मक निर्भीकता और भाषाई संवेदनशीलता का प्रमाण है। यह रचना न केवल पढ़ी जाती है, बल्कि सुनी और महसूस की जाती है। यह काव्यांश हमें यह भी सिखाता है कि जीवन की राहों में अनावश्यक चकराव और श...