नव लय पथ
नव लय पथ
भूमिका
शब्द जब लय से मुक्त होकर भी संगीत रचते हैं, तब वे केवल अभिव्यक्ति नहीं रहते—वे अनुभव बन जाते हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ उसी अनुभव की एक सजीव मिसाल हैं, जहाँ छंद की परंपरागत सीमाओं से परे जाकर भी भाषा अपनी आंतरिक ताल और स्वाभाविक प्रवाह से पाठक को बाँध लेती है।
अगर-मगर की उलझनों को झटक कर, सटर-पटर की चंचलता में मटक कर, और नगर-नगर बसर करते हुए जीवन की विविधता को समेटती ये पंक्तियाँ हमें एक ऐसे भावलोक में ले जाती हैं, जहाँ हर शब्द अपने आप में एक चित्र है, हर ध्वनि एक स्पंदन। यहाँ न केवल यात्रा है, बल्कि उस यात्रा का जीवंत उत्सव भी है—डगर-डगर भटकने की बेचैनी, रमक-झमक की आभा, और लहक-महक की सहजता।
विजया डालमिया जी का यह अमात्रिक प्रयास परंपरा और नव्यता के अद्भुत संगम का परिचायक है। बिना मात्राओं के बंधन में बँधे, उन्होंने जिस प्रकार ध्वनियों और शब्दों के सहारे एक लयात्मक संसार रचा है, वह उनकी सृजनात्मक निर्भीकता और भाषाई संवेदनशीलता का प्रमाण है। यह रचना न केवल पढ़ी जाती है, बल्कि सुनी और महसूस की जाती है।
यह काव्यांश हमें यह भी सिखाता है कि जीवन की राहों में अनावश्यक चकराव और शोर से दूर रहकर, यदि हम अपने भीतर की लय को पहचान लें, तो हर डगर एक उत्सव बन सकती है।
ऐसे अनूठे और प्रयोगधर्मी सृजन के लिए विजया डालमिया जी को हार्दिक अभिनंदन। यह प्रयास साहित्य के आकाश में एक नई चमक जोड़ता है, जो आने वाले समय में अनेक रचनाकारों को प्रेरित करेगा।
कविता
अगर-मगर झटक कर
सटर-पटर मटक कर
नगर-नगर बसर कर
चकर -चकर मत कर
डगर-डगर भटक कर
रमक-झमक तमक कर
झनक-खनक मत कर
लहक-महक चहक कर
रचनाकार
राष्ट्रीय संयोजिका
उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका विंग)
हैदराबाद (तेलंगाना)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति






टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें