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मेरी गुन्नू

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  मेरी गुन्नू मेरी गुन्नू गुनगुन करती मुस्कानों के मोती झरती आँखों में शरारत लेकर हर दिल में प्यार है भरती वो सोई जब तक रहती मेरी कोई सुबह ना होती आँखों से आँखें मिलते ही मेरी उसकी बातें होतीं सूना आँगन, सूना सा मन पास जब तक न ठुमकती ना कोई हल्ला, ना ही हलचल भागम भाग जब ना करती नाजुक नन्हा स्पर्श देकर प्राणों में संजीवनी भरती मेरी गुन्नू गुनगुन करती मुस्कानों के मोती झरती  सृजक   विजया डालमिया राष्ट्रीय संयोजिका  उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका विंग) हैदराबाद (तेलंगाना) पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति   

रंगों, रिश्तों और भाषा के बीच नन्ही दुनिया की सच्चाई

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रंगों, रिश्तों और भाषा के बीच एक नन्ही दुनिया की सच्चाई भूमिका यह रचना केवल एक बच्ची मिन्सा और उसकी फूप्पी के बीच होने वाली मासूम बातचीत का विवरण भर नहीं है, बल्कि बदलते समय, रिश्तों की ऊष्मा और भाषा के बदलते स्वरूप का एक जीवंत दस्तावेज़ है। इसमें बचपन की सहज जिज्ञासा, रचनात्मकता की उड़ान, और नई पीढ़ी के मन में पल रहे आधुनिक प्रभावों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। मिन्सा की ड्रॉइंग, उसकी मासूम जिद, “नज़र लग जाएगी” जैसी धारणाएँ, और हिन्दी के प्रति उसका झिझक भरा विरोध—ये सब मिलकर उस मनोभूमि को उजागर करते हैं जहाँ परंपरा और आधुनिकता आमने-सामने खड़ी हैं। वहीं फूप्पी का स्नेह, हल्की-सी झुंझलाहट, और भीतर छिपी संवेदनशील समझ इस पूरे प्रसंग को भावनात्मक गहराई प्रदान करती है। इस कथा में पुस्तक मेले का दृश्य, पुरानी यादों की मिठास, और रिश्तों की आत्मीयता एक साथ गुंथकर यह संदेश देती है कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, बचपन की सादगी, रिश्तों की गरमाहट और सृजन की शक्ति हमेशा जीवित रहती है—बस उसके रंग और माध्यम बदल जाते हैं। "फूप्पी, मैं आपको अपनी ड्रॉइंग दिखाऊँ?" "दिखा। ये क्या बनाया है, मि...

बाल कविता

  बाल कविता आजा कब्बू, आजा कब्बू  बाबू तुझको पुकारे कब्बू उड़ते पक्षी उड़ती चिड़िया  बाबू सबको पुकारे कब्बू  मम्मी बोले, पापा बोले  आया कब्बू, आया कब्बू  बाबू की किलकारी गूंजे  हाथ हिलाकर बोले कब्बू  बाबू की दुनिया अलबेली  फुर्र-फुर उड़ता जिसमें कब्बू  बाबू को कब्बू है प्यारा तुतलाकर बोले कब्बू, कब्बू विजया डालमिया संपादक (मेरी निहारिका) और राष्ट्रीय संयोजिका, उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका विंग)

बाल कविता

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बाल कविता  सपड़-सपड़... लपड़-लपड़  आ फल कर ... गपड़-गपड़  धकड़-धकड़ ...पकड़-पकड़   आम खाए.. चपड़-चपड़   चटक-चटक...मटक-मटक   सब कर... लपक-लपक रमक-रमक...झमक-झमक  जल भर.. छपक-छपक  भटक-भटक ...लटक-लटक   भाग-दौड़... फटक..फटक  रचनाकार विजया डालमिया पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति