रंगों, रिश्तों और भाषा के बीच नन्ही दुनिया की सच्चाई
"फूप्पी, मैं आपको अपनी ड्रॉइंग दिखाऊँ?"
"दिखा।
ये क्या बनाया है, मिन्सा?"
"ये औरत है, फूप्पी।"
"औरत ऐसी होती है? सींग कब होते हैं औरत के?"
"अरे फूप्पी! वो सींग नहीं, औरत के कान हैं।"
यह दो साल पुरानी ड्रॉइंग है और तहरीर भी।
अभी मिन्सा बहुत सुंदर ड्रॉइंग बनाती है। मुझसे कलर ड्रॉइंग बुक अलग लेती है, मम्मा से अलग।
कभी पूछो कि क्या चाहिए, तो कहेगी—
"फूप्पी, वो डायरी बड़ी वाली जैसे आपकी है, कलर और ड्रॉइंग बुक!"
सुंदर-सी ड्रॉइंग बनाकर दिखाती है, मगर अब फोटो नहीं लेने देती।
"नो फूप्पी, नो! आप फेसबुक पर शेयर करोगी, मुझे नज़र लग जाएगी!"
"मिन्सा, नज़र का फोबिया नहीं होना चाहिए। हर वक़्त नज़र लग जाएगी सोचते रहने से सचमुच साइकोलॉजिकल बीमारों जैसी फीलिंग होने लगती है।"
"हैलो मिन्सा, क्या कर रही है बेटा?"
"फूप्पी, मैं ड्रॉइंग बना रही हूँ!"
"तुम्हारा इम्तिहान है न? किस सब्जेक्ट का?"
"मैथ्स!"
"फिर ये ड्रॉइंग क्यों बन रही है? ग़लत बात है न! It's not fair!"
"अरे फूप्पी, मेरी पूरी तैयारी है मैथ्स की। मुझे आपकी तरह मैथ्स से डर नहीं लगता!"
"तुम्हें किसने बताया मुझे मैथ्स से डर लगता है?"
"पापा ने!"
"और क्या-क्या बताया है पापा ने?"
"हाँ, बताया है न!
आप भी बचपन में मेरी तरह ड्रॉइंग बनाती रहती थीं।
जब ड्रॉइंग बुक ख़त्म हो जाती थी तो दीवारों पर ड्रॉइंग करती रहती थीं।
एक बार दादी ने आपको झाड़ू से पीटा भी था, क्योंकि आप जब देखो तब ड्रॉइंग बनाती रहती थीं।
जब दादा ने नया पेंट करवा दिया था, आपने नए पेंट वाली दीवार पर भी बड़ा-सा मेंगो बना दिया था।
शाम को आपकी पिटाई होने वाली थी, पर दादा जी ने आपको कुछ नहीं कहा, बल्कि बड़े-बड़े ड्रॉइंग पोस्टर और वॉटर कलर लाकर दे दिए।"
"अच्छा, तो जहांगीर सब कुछ बताता है तुम्हें।"
"हैलो आपी, कहाँ हो?"
"बुक फेयर।"
"अए हए! इतनी ठंड में?"
"मैं तो ख़ामख़ां डर रही थी। यहाँ बुक फेयर के तंबू में बिल्कुल भी सर्दी नहीं लग रही। स्टॉल, दुपट्टा, कोट सब लादकर निकली थी। अब संभल नहीं रहे—किताबें संभालूँ कि ये दो-दो दुपट्टे-स्टॉल!"
"हा-हा, आपी! आप भी हद करती हो।"
"और बताओ, कैसा चल रहा है वीकेंड?"
"बड़ा अच्छा। अभी सब स्नो-फॉल के नज़ारे देख रहे हैं।"
"मिन्सा कहाँ है?"
"ये रहे, दोनों यहीं खेल रहे हैं!"
"मम्मा, मुझे फूप्पी से बात करनी है।"
"क्या बात करनी है?"
"मैं सब सुन रही हूँ। वो बुक फेयर गई हैं, मेरे लिए ड्रॉइंग और कलर लेकर आएँगी।"
वो ख़ुद परेशान हैं—अपने दुपट्टे, स्टॉल और किताबें संभल नहीं रहे उनसे, और तू और बता दे ड्राइंग-कलर।
वहाँ नहीं मिलेगा।
लास्ट डे था। राजकमल प्रकाशन में खचाखच भीड़। जनवरी में भी पसीने छूट रहे थे। सब जगह भीड़ ही थी। बाहर खुली जगह जाकर ही सुकून महसूस किया।
बड़ी मुश्किल से कुछ किताबें मिलीं, कुछ नहीं।
मेरे साथ मेरी दो-तीन स्टूडेंट भी थीं। बीच-बीच में उनका भी ख़्याल रखना था।
मेरी फेसबुक मित्र डॉ. ज़रीन मिलीं। बहुत अच्छा लगा। वे बहुत मुहब्बत से गले मिलीं और अपनी किताब दिखाई।
उन्होंने मुझे बतौर तोहफ़ा घर भी भेज दी है। मैं पढ़कर यहाँ साझा करूँगी, इंशाल्लाह।
साउथ कैंपस के सीनियर निलांबुज मिले। कितना अच्छा लगा—कोई अपने कैंपस का शख़्स मिला।
साउथ कैंपस मुझे सबसे अज़ीज़ जगह लगती है। यूँ तो फ़िरदौस मस्जिद, कालिंदी कॉलेज, जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, मेरा प्राइमरी और हाईस्कूल—सब हर वक़्त ज़ेहन में ताज़ा रहते हैं, मगर साउथ कैंपस की जगह कोई नहीं ले सकता।
इसीलिए साउथ कैंपस का कोई कहीं मिल जाता है तो ऐसा लगता है जैसे कहीं दूर-दराज़ प्रदेश में अपने गाँव या शहर-मोहल्ले का कोई बाशिंदा मिल जाए।
हालाँकि निलांबुज और बहुत-से लोगों से आमने-सामने कभी बात नहीं हुई, फिर भी वे सब अपने-से लगते हैं।
किताबें तो कुछ आ गई थीं बुक फेयर से, कुछ ऑनलाइन आएँगी। पढ़ी भी जा रही हैं।
एक रोज़ कुछ किताबें मिन्सा के हाथ लग गईं—
बानू मुश्ताक़ की 'हृदय दीप',
नेहा नरूका की 'फटी हथेलियाँ',
अदनान कफ़ील दरवेश का 'लानत का प्याला'।
तीनों किताबें छुपा दीं और ख़फ़ा-ख़फ़ा फिर रही!
"जाओ, मुझे नहीं करनी आपसे बात।"
"क्यों?"
"आप बुक फेयर से थैला भरकर किताबें लाई हैं। मेरी ड्रॉइंग बुक और कलर क्यों नहीं लाई?"
"मिन्सा, थोड़ी देर के लिए घूमी थी इधर-उधर। और थैला किधर है? बहुत कुछ तो मिला ही नहीं।
किड्स के लिए कुछ ख़ास नहीं था। उर्दू-हिन्दी की कहानी, नज़्म, कविता की किताबें थीं—वो तुमने पढ़नी नहीं हैं, हर वक़्त कहते फिरते हो।"
"फूप्पी, I hate Hindi! I hate Hindi Kavita!"
"ड्रॉइंग का भी कुछ अच्छा नहीं था। चल, मैं अर्जुन भैया की दुकान से दिला दूँ।"
"नो फूप्पी! मुझे वहीं से चाहिए था—बुक फेयर से। अब मैं आपकी किताबें नहीं दूँगी।"
"किताबें नहीं देगी मतलब?"
"मतलब मैंने चुराकर रख दी हैं, जो अभी थोड़ी देर पहले आप पढ़ रही थीं।"
"अच्छा! तभी नज़र नहीं आ रही। कहाँ हैं? दे—तेरे काम की नहीं हैं। दिखा कहाँ छुपाई हैं।
अच्छा, गुस्सा नहीं होते। मैं अपनी बेटी को जो कहेगी, वो दिला दूँगी।"
तकिये के नीचे से निकालकर पूछती है—
"इनमें से हिन्दी कविता की कौन-सी है?"
"ये दोनों!"
"लो, ये दोनों तुम ले लो!"
"इसमें क्या है?"
"हिन्दी में अनूदित कहानियाँ!"
"फूप्पी, I hate Hindi!"
"ये लो अपनी हिन्दी।"
"हाँ, ला दे मेरी हिन्दी!
अंग्रेज़न!"
मेरी दुआ है वो अंग्रेज़नी ही बने—सिर उठाकर जिए, खूब ख़ुदमुख़्तार बने। काम चलाऊ बोलने-लिखने लायक़ हिन्दी तो सीख ही लेगी।
यही वक़्त की सच्चाई है।
— मेहजबीं
डॉ राकेश राणा द्वारा प्रेषित

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