बालमन की अनकही दुनिया को समझने वाली काउंसलर शिखा अग्रवाल से बातचीत

बालमन को समझने वाली काउंसलर शिखा जी से बातचीत

यह केवल एक साक्षात्कार भर नहीं, अपितु एक संवेदनशील शिक्षिका, काउंसलर और बाल-मनोविज्ञान की गहरी समझ रखने वाली व्यक्तित्व के विचारों का ऐसा संवाद है, जो समाज, अभिभावकों और शिक्षकों—तीनों को दिशा देता है।


विशेष साक्षात्कार

जब बड़े शब्द बोलते हैं, बच्चे भावनाएँ सुनते हैं। 

प्रश्न १. आपकी कहानी "कक्षा की अनकही कहानी" ने अनगिनत लोगों को भावुक किया। इस घटना ने आपको सबसे बड़ा जीवन-पाठ क्या सिखाया?

शिखा अग्रवाल : "इस घटना ने मुझे सिखाया कि किसी भी बच्चे का व्यवहार उसकी पूरी पहचान नहीं होता। कई बार उसका व्यवहार केवल उसके भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष का एक संकेत होता है। यदि हम केवल प्रतिक्रिया देखें, तो बच्चे को खो देंगे; यदि उसके पीछे की भावना समझ लें, तो उसका विश्वास जीत सकते हैं।"

प्रश्न २. आपने उस छात्र को डाँटने के बजाय धैर्य चुना। आज के शिक्षकों के लिए यह कितना आवश्यक है?

उत्तर : "शिक्षक का पहला दायित्व पढ़ाना नहीं, समझना है। अनुशासन आवश्यक है, लेकिन संवेदनशीलता उससे भी अधिक आवश्यक है। जब बच्चा सुरक्षित महसूस करता है, तभी वह सीखने के लिए तैयार होता है। विश्वास के बिना शिक्षा केवल सूचना बनकर रह जाती है।"

प्रश्न ३. आपने लिखा कि "जब बड़े शब्द बोलते हैं, बच्चे भावनाएँ सुनते हैं।" इस विचार का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर : "बच्चे शब्दों की भाषा से पहले भावनाओं की भाषा सीखते हैं। वे यह नहीं गिनते कि किसने क्या कहा, लेकिन यह अवश्य महसूस कर लेते हैं कि घर में तनाव है, माँ रो रही हैं, पिता मौन हैं या दादा-दादी नाराज़ हैं। वे वातावरण को आत्मसात करते हैं और वही उनके व्यवहार में दिखाई देता है।"

प्रश्न ४. क्या विद्यालय में दिखने वाली अधिकांश व्यवहारगत समस्याओं की जड़ घर के वातावरण में होती है?

उत्तर : "हर बार नहीं, लेकिन बहुत बार ऐसा होता है। बच्चा अपने घर का भावनात्मक दर्पण होता है। यदि परिवार में संवाद, सम्मान और अपनापन है तो उसका प्रभाव विद्यालय में भी दिखाई देता है। यदि घर में लगातार तनाव है तो बच्चा अक्सर उसे अपने व्यवहार के माध्यम से व्यक्त करता है।"

प्रश्न ५. अभिभावकों और दादा-दादी के लिए आपका क्या संदेश है?

उत्तर : "हर परिवार में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन बच्चों के सामने एक-दूसरे का सम्मान बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। बच्चों के सामने कटु आलोचना, अपमान या दोषारोपण उनके मन में अपराधबोध और असुरक्षा पैदा कर सकता है। उन्हें केवल अच्छा भविष्य नहीं, सुरक्षित वर्तमान भी चाहिए।"

प्रश्न ६. एक शिक्षक कैसे पहचान सकता है कि बच्चा अनुशासनहीन नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से संघर्ष कर रहा है?

उत्तर : "यदि किसी बच्चे के व्यवहार में अचानक परिवर्तन आए, वह चिड़चिड़ा हो जाए, अलग-थलग रहने लगे, बार-बार क्रोधित हो या पढ़ाई में रुचि कम हो जाए, तो केवल दंड देने के बजाय उससे संवाद करना चाहिए। कई बार एक मुस्कान, एक प्रश्न—"क्या तुम ठीक हो?"—पूरी कहानी बदल देता है।"

प्रश्न ७. आप एक काउंसलर भी हैं। बच्चों की सबसे बड़ी भावनात्मक आवश्यकता क्या है?

उत्तर : "सुना जाना।

हर बच्चा चाहता है कि कोई बिना निर्णय किए उसकी बात सुने। सलाह बाद में भी दी जा सकती है, लेकिन पहले उसे यह अनुभव होना चाहिए कि उसकी भावनाएँ भी महत्वपूर्ण हैं।"

प्रश्न ८. आज की शिक्षा व्यवस्था में आपको सबसे बड़ी कमी क्या दिखाई देती है?

उत्तर : "हम परिणामों पर बहुत ध्यान देते हैं, लेकिन भावनात्मक विकास पर अपेक्षाकृत कम। अंक, प्रतियोगिता और उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं, पर यदि बच्चा भीतर से असुरक्षित है तो उसकी सफलता भी अधूरी रह जाती है। शिक्षा में भावनात्मक साक्षरता को उतना ही महत्व मिलना चाहिए जितना अकादमिक उत्कृष्टता को।"

प्रश्न ९. यदि प्रत्येक शिक्षक अपने जीवन में केवल एक परिवर्तन कर ले, तो वह क्या होना चाहिए?

उत्तर : "हर दिन कम-से-कम एक बच्चे से बिना किसी शैक्षणिक कारण के बात करें। केवल यह पूछें—"आज तुम्हारा दिन कैसा रहा?" विश्वास की शुरुआत यहीं से होती है।"

प्रश्न १०. यदि प्रत्येक अभिभावक अपने व्यवहार में केवल एक परिवर्तन कर ले, तो वह क्या होना चाहिए?

उत्तर : "बच्चे की गलती को उसकी पहचान मत बनाइए। गलती पर चर्चा कीजिए, लेकिन बच्चे को यह विश्वास भी दीजिए कि वह आपके प्रेम और सम्मान का अधिकारी है। जब बच्चा सुरक्षित महसूस करता है, तभी वह स्वयं को बेहतर बनाने का साहस जुटाता है।"

कुछ त्वरित प्रश्न

● एक शब्द में शिक्षा?

– जीवन।

● सबसे बड़ा शिक्षक?

– अनुभव।

● सबसे बड़ी कक्षा?

– परिवार।

● सबसे कठिन विषय?

– स्वयं को समझना।

● सबसे आवश्यक कौशल?

– संवेदनशील संवाद।

● आपका जीवन मंत्र?

– "हर व्यवहार के पीछे एक कहानी होती है; निर्णय लेने से पहले उसे सुनने का धैर्य रखिए।"

समापन संदेश

शिखा अग्रवाल की ओर से

"हम बच्चों को अच्छे विद्यालय, अच्छे संसाधन और अच्छा भविष्य देने की चिंता करते हैं, लेकिन सबसे पहले उन्हें एक ऐसा वातावरण दीजिए जहाँ वे बिना डर के अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकें।"

स्मरण रहे

'जब बड़े शब्दों का आदान-प्रदान करते हैं, तब बच्चे भावनाओं का भार अपने भीतर संजो लेते हैं।'

यदि हम इस एक सत्य को समझ लें, तो न केवल बच्चों का बचपन सुरक्षित होगा, बल्कि परिवार और समाज दोनों अधिक संवेदनशील बन सकेंगे।

सूचना स्रोत

      श्रीमती विजया डालमिया जी
 राष्ट्रीय संयोजिका, उलझन सुलझन
        महिला लेखिका प्रकोष्ठ

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