प्रकृति (द्वितीय अभ्यास सत्र)
रमन वन मन हर सकत। मंद पवन व कल कल जल मन हर सकत। नभ स्वच्छ नभ। मन वन संग रम। कण कण मध रस भर। तन मन तृप्त बन। वन धन अमर धन रमन समझ।
कल्पना
यह प्रयास विद्यालय जाने वाले शिशुओं की सहायतार्थ है उनके अभिभावकों के लिए जिसमें उनको मिलेंगे नित्यप्रति वो अभ्यास जिनका वो शिशुओं को अभ्यास करवाकर अतिशीघ्र हिंदी भाषा को समझा सकेंगे। किसी भी श्रेय की कामना से कहीं परे यह विशुद्ध पवित्र हृदय से तैयार ब्लॉग है। इसी में आगे भी शोध जारी रहेंगे इसको और सरलीकृत करने की दिशा में। टीम उलझन सुलझन को यकीन है कि हम निश्चय ही होंगे कामयाब।
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